प्यार की चाहत । प्यार पर कविता - जीतेन्द्र गुरदह

शीर्षक :  प्यार की चाहत 


एक प्यार की चाहत में 

इधर-उधर भटक रहे थे हम ,

दिल लगे किसी बेबफा से

कोशिस कर रहे थे हम ,

अलबेलों की दुनिया में 

ये दिल भी अलबेला था ,

लाखों की भीड़ है दुनिया मे 

मगर , ये दिल अकेला था ,

डूबना तो हम भी चाहते थे इश्क में उसके 

मगर प्यार में ठोकर खाने का डर था उसके ,

अनजान थे बेपरवाह थे 

वो जानबूझकर लापरवाह थे ,

रूठी हुई थी जिन्दगी हमसे

कोई जिन्दगी मे आये कैसें ,

प्यार की चाहत कल भी थी 

प्यार की चाहत आज भी है ,

तन्हा कल भी थे हम 

और तन्हा आज भी है ,

सब कुछ भूल गये मगर 

बीते प्यार के पलों को भुलाए कैसे ।।


लेखक / कवि : जीतेन्द्र मीना ' गुरदह 

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