मुश्किलों से हारना हमें नही आता ( मेरी मंजिल ) : जीतेन्द्र मीना

मुश्किलों से हारना 

हमें नहीं आता 

कोई कितना भी रोके 

रुक जाना हमे नहीं आता । 


लोग कोशिश करना छोड़ देते हैं 

अपनी मंजिल को पाने के लिये 

पर बिना मंजिल को पाए 

रुक जाना हमे नहीं आता । 


मंजिल भी उसकी थी 

रास्ता भी उसका था 

एक मैं ही अकेला था 

बाकि सारा काफ़िला भी उसी का था । 


एक साथ चलने की सोच 

भी उसकी थी 

और बाद में रास्ता बदलने 

का फैसला भी उसी का था । 


ना किसी से कोई ईर्ष्या है 

ना किसी से कोई होड़ है 

मेरी अपनी मंजिल है 

और मेरी अपनी दौड़ है । 


मिट्टी का तन है 

दिन रात क्या सजाना 

मिट्टी ही मंजिल है 

तन पर क्या इतराना । 


कोशिश के बावजूद 

हो जाती है कभी हार 

होकर निराश मत बैठना 

ऐ मेरे यार । 


बढ़ते रहना आगे ही 

जैसे भी मौसम हो 

आखिर पा लेती है 

मंजिल चींटी भी 

गिर गिर कर कई बार । 


लेखक / कवि-  जीतेन्द्र मीना ' गुरदह '



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